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विवाह के बादशादी के बाद गृह प्रवेश: दुल्हन के स्वागत की रस्म
गृह प्रवेश वह रस्म है जिसमें नई दुल्हन पहली बार अपने ससुराल में कदम रखती है और परिवार उसका आरती और प्यार से स्वागत करता है। यह विदाई के बाद की सबसे पहली और ख़ुशी भरी रस्म है।
गृह प्रवेश क्या है
विदाई के बाद जब दूल्हा-दुल्हन ससुराल पहुँचते हैं, तो दुल्हन सीधे घर में नहीं आती। दरवाज़े पर दूल्हे की माँ, यानी सास, और घर की दूसरी महिलाएँ आरती की थाली लेकर उसका स्वागत करती हैं। इसके बाद एक तय क्रम में कुछ छोटी रस्में होती हैं और फिर दुल्हन घर में प्रवेश करती है।
ध्यान रहे, यह शादी के बाद का गृह प्रवेश है, जो नए घर में शिफ़्ट होने वाले गृह प्रवेश से अलग रस्म है।
अर्थ और प्रतीक
सबसे जानी-पहचानी रस्म है चावल से भरा कलश। दरवाज़े की दहलीज़ पर चावल से भरा एक छोटा कलश या लोटा रखा जाता है, जिसे दुल्हन अपने दाहिने पैर से धीरे से गिराती है और चावल घर के अंदर बिखर जाते हैं। परंपरा में माना जाता है कि नई बहू घर में अन्न, धन और समृद्धि लेकर आती है, और कई परिवार उसे लक्ष्मी के रूप में देखते हैं।
इसके बाद कई घरों में दुल्हन आलता या कुमकुम मिले पानी की थाली में पैर रखकर घर के अंदर चलती है, जिससे फ़र्श पर उसके पैरों के लाल निशान बनते हैं। ये निशान उसके पहले कदमों की याद होते हैं और इन्हें शुभ माना जाता है।
कौन क्या करता है
- सास या घर की बड़ी महिला आरती करती है और दुल्हन का तिलक करती है।
- ननदें अक्सर दरवाज़ा रोककर भाई से "नेग" यानी उपहार माँगती हैं। यह प्यार भरी छेड़छाड़ है।
- दुल्हन कलश गिराती है और फिर पैरों के निशान छोड़ती हुई अंदर आती है।
- दूल्हा-दुल्हन घर के मंदिर या पूजा स्थान पर जाकर प्रणाम करते हैं।
- इसके बाद कई परिवारों में मज़ेदार खेल होते हैं, जैसे दूध और पानी भरे बर्तन में अँगूठी ढूँढना।
कब होती है
गृह प्रवेश विदाई के बाद, दुल्हन के ससुराल पहुँचते ही होता है। कुछ परिवार इसके लिए भी शुभ समय देखते हैं, जिसके लिए मुहूर्त की जानकारी काम आ सकती है। इसके बाद के दिनों में मुँह दिखाई और रिसेप्शन जैसी रस्में और आयोजन होते हैं।
क्षेत्रीय अंतर
उत्तर भारत में कलश गिराने की रस्म सबसे आम है। बंगाल में "बोउ बरन" होता है, जिसमें सास दुल्हन का स्वागत करती है और दुल्हन आलता और दूध की थाली में पैर रखकर अंदर आती है। महाराष्ट्र में "गृहप्रवेश" के साथ कई परिवारों में दुल्हन का नाम बदलने की परंपरा भी रही है, जिसे आज बहुत से परिवार नहीं मानते। दक्षिण भारत में दुल्हन को दाहिना पैर पहले रखकर घर में आने को कहा जाता है और दीपक जलाकर स्वागत किया जाता है। पंजाबी परिवारों में "पानी वारना" होता है, जिसमें सास दूल्हा-दुल्हन के सिर के ऊपर से पानी का लोटा घुमाती है और फिर थोड़ा पानी पीती है।
आज के परिवारों के लिए व्यावहारिक सुझाव
- दुल्हन लंबे सफ़र और भावुक विदाई के बाद थकी होती है। रस्में छोटी और सहज रखें।
- कलश हल्का हो और फ़र्श फिसलन वाला न हो, ताकि भारी लहंगे में दुल्हन को परेशानी न हो।
- आलता के निशान वाली जगह पर पहले से कपड़ा या कागज़ बिछा सकते हैं, अगर फ़र्श पर दाग नहीं चाहते।
- खेलों में हार-जीत को मज़ाक तक रखें। नई बहू को किसी भी तरह असहज महसूस न कराएँ।
- दुल्हन को पहले दिन ही घर के सब लोगों के नाम और रिश्ते बताएँ, इससे वह जल्दी अपनापन महसूस करती है।
तारीख तय कर रहे हैं?
मुहूर्त कैलेंडर में हर महीने की शुभ विवाह तिथियाँ और उनके समय हैं।
विवाह मुहूर्त कुंडली मिलानQuestions people ask
गृह प्रवेश में चावल का कलश क्यों गिराया जाता है?
परंपरा में माना जाता है कि नई बहू घर में अन्न और समृद्धि लेकर आती है। चावल का बिखरना इसी शुभता का प्रतीक है।
शादी के बाद का गृह प्रवेश और नए घर का गृह प्रवेश एक ही है?
नहीं। शादी के बाद का गृह प्रवेश नई दुल्हन के स्वागत की रस्म है, जबकि नए घर का गृह प्रवेश नए मकान में रहने की शुरुआत से जुड़ी पूजा है।
गृह प्रवेश में आलता के पैर क्यों बनाए जाते हैं?
दुल्हन के पहले कदमों के निशान घर में शुभ माने जाते हैं और कई परिवार उन्हें याद के तौर पर सँभालकर रखते हैं।
गृह प्रवेश के बाद कौन-से खेल होते हैं?
आम तौर पर दूध-पानी के बर्तन में अँगूठी ढूँढने जैसे खेल होते हैं, जो दूल्हा-दुल्हन के बीच हँसी-मज़ाक और सहजता लाते हैं।
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