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विवाह के दिन

मंगलसूत्र की रस्म: अर्थ, डिज़ाइन और परंपरा

मंगलसूत्र वह हार है जो विवाह के दौरान दूल्हा दुल्हन के गले में पहनाता है। यह भारत के बहुत से हिस्सों में विवाहित स्त्री की पहचान माना जाता है।

मंगलसूत्र क्या है

"मंगल" का अर्थ है शुभ और "सूत्र" का अर्थ है धागा। यानी मंगलसूत्र एक शुभ धागा है। उत्तर और पश्चिम भारत में यह आम तौर पर काले मोतियों और सोने के मनकों की माला होती है, जिसके बीच में एक पेंडेंट लगा होता है। दक्षिण भारत में इसे "थाली" या "ताली" कहा जाता है और यह अक्सर पीले धागे या सोने की चेन में बँधा एक लटकन होता है।

विवाह के दौरान दूल्हा यह हार दुल्हन के गले में पहनाता है। कई परंपराओं में दूल्हा इसमें गाँठें भी लगाता है, और कहीं-कहीं दूल्हे की बहन इसमें मदद करती है।

अर्थ और प्रतीक

परंपरा में माना जाता है कि मंगलसूत्र पति-पत्नी के बंधन और दांपत्य की खुशहाली का प्रतीक है। काले मोतियों को लेकर लोक-मान्यता है कि ये बुरी नज़र से बचाते हैं, जबकि सोना समृद्धि और शुभता से जोड़ा जाता है।

दक्षिण भारत की थाली में गाँठों को अक्सर शरीर, मन और आत्मा, या पति, पत्नी और ईश्वर के प्रति निष्ठा जैसे अर्थों से जोड़ा जाता है। ये व्याख्याएँ परिवार और परंपरा के अनुसार अलग हो सकती हैं।

आज मंगलसूत्र बहुत से रूपों में मिलता है, भारी पारंपरिक डिज़ाइन से लेकर रोज़ पहनने वाले हल्के और आधुनिक डिज़ाइन तक। कई महिलाएँ इसे हर दिन पहनती हैं और कई ख़ास मौकों पर। यह उनकी अपनी पसंद है।

कौन क्या करता है

  • मंगलसूत्र आम तौर पर दूल्हे के परिवार की ओर से आता है।
  • पंडित जी मंत्र पढ़ते हैं और दूल्हा दुल्हन के गले में मंगलसूत्र पहनाता है।
  • दक्षिण भारत की कई परंपराओं में दूल्हा पहली गाँठ लगाता है और उसकी बहन बाकी गाँठें लगाती है।
  • इस दौरान ढोल-नगाड़े या शहनाई बजती है और मेहमान अक्षत बरसाते हैं।
  • घर के बड़े दोनों को आशीर्वाद देते हैं।

कब होती है

उत्तर भारत में मंगलसूत्र आम तौर पर फेरों के बाद, सिंदूर दान के साथ या उसके आसपास पहनाया जाता है। दक्षिण भारत में "थाली बाँधना" या "मांगल्य धारणम" विवाह की सबसे अहम रस्म होती है और अक्सर मुहूर्त के ठीक समय पर की जाती है। मंगलसूत्र के बाद विवाह की मुख्य रस्में पूरी हो जाती हैं और विदाई की तैयारी शुरू होती है।

क्षेत्रीय अंतर

  • महाराष्ट्र में मंगलसूत्र में दो कटोरी जैसे पेंडेंट होते हैं और यह काले मोतियों की दोहरी लड़ी में होता है।
  • तमिलनाडु में "थाली" के डिज़ाइन अक्सर परिवार की परंपरा के अनुसार तय होते हैं।
  • केरल में "मिन्नु" नाम का छोटा लटकन होता है।
  • आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में "मंगलसूत्रम" में दो सोने के गोल टुकड़े होते हैं, एक दुल्हन के परिवार से और एक दूल्हे के परिवार से।
  • बंगाल में मंगलसूत्र की जगह परंपरागत रूप से शाखा-पोला और लोहे का कड़ा, जिसे "लोहा" कहते हैं, नवविवाहिता की पहचान है, हालाँकि अब मंगलसूत्र भी आम है।
  • उत्तर भारत में मंगलसूत्र पहले कम प्रचलित था, पर अब लगभग हर शादी का हिस्सा है।

आज के परिवारों के लिए व्यावहारिक सुझाव

  • मंगलसूत्र दुल्हन की पसंद से चुनें। जिसे वह रोज़ पहनेगी, उसका डिज़ाइन उसे अच्छा लगना ज़रूरी है।
  • अगर दुल्हन कामकाजी है या भारी गहने पसंद नहीं करती, तो एक भारी पारंपरिक और एक हल्का रोज़ाना वाला मंगलसूत्र रखा जा सकता है।
  • गाँठें या हुक मज़बूत हों, ताकि शादी के दिन भीड़ में खुले नहीं।
  • शुद्धता और रसीद के साथ भरोसेमंद जगह से ख़रीदें।
  • मंगलसूत्र कब और कैसे पहनना है, इस पर परिवार दुल्हन की पसंद का सम्मान करें।

सभी रस्मों का पूरा क्रम विवाह की रस्में पेज पर है।

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मंगलसूत्र कौन पहनाता है?

विवाह के दौरान दूल्हा दुल्हन को मंगलसूत्र पहनाता है। कुछ दक्षिण भारतीय परंपराओं में दूल्हे की बहन भी गाँठें लगाने में मदद करती है।

मंगलसूत्र में काले मोती क्यों होते हैं?

लोक-मान्यता है कि काले मोती बुरी नज़र से बचाते हैं। सोने के मनके शुभता और समृद्धि से जोड़े जाते हैं।

मंगलसूत्र और थाली में क्या अंतर है?

दोनों का भाव एक है। उत्तर और पश्चिम भारत में काले मोतियों वाला हार मंगलसूत्र कहलाता है, जबकि दक्षिण भारत में धागे या चेन पर बँधा लटकन थाली कहलाता है।

क्या मंगलसूत्र रोज़ पहनना ज़रूरी है?

यह हर महिला की अपनी पसंद है। कई महिलाएँ इसे रोज़ पहनती हैं और कई केवल ख़ास मौकों पर।

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