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विवाह के दिनमिलनी की रस्म: दोनों परिवारों का औपचारिक मिलन
मिलनी वह रस्म है जिसमें बारात पहुँचने पर दुल्हन और दूल्हे के परिवार के एक जैसे रिश्ते वाले लोग, जैसे दोनों पिता, दोनों मामा, आपस में गले मिलते हैं और उपहार देते हैं। यह दो परिवारों के औपचारिक जुड़ाव की सबसे सुंदर तस्वीर है।
मिलनी क्या है
मिलनी का अर्थ ही है "मिलना"। जब बारात दुल्हन के घर या शादी के स्थान पर पहुँचती है, तो सबसे पहले दोनों परिवारों के बराबर रिश्ते वाले लोग एक-दूसरे से मिलते हैं। दुल्हन के पिता दूल्हे के पिता से मिलते हैं, दुल्हन के मामा दूल्हे के मामा से, चाचा चाचा से, और इसी तरह।
हर जोड़ी के मिलने पर दुल्हन के पक्ष से दूल्हे के पक्ष के व्यक्ति को माला पहनाई जाती है, गले लगाया जाता है और कई परिवारों में शगुन या कोई छोटा उपहार भी दिया जाता है। यह रस्म ख़ासकर पंजाबी और सिख परिवारों में बहुत प्रचलित है, हालाँकि उत्तर भारत के कई दूसरे परिवार भी इसे निभाते हैं।
अर्थ और प्रतीक
मिलनी इस बात का प्रतीक है कि शादी केवल दो लोगों की नहीं, दो पूरे परिवारों की होती है। बराबर रिश्ते वाले लोगों का मिलना यह दिखाता है कि अब हर रिश्ते का एक नया साथी है, यानी दूल्हे के मामा को अब दुल्हन के मामा के रूप में एक नया रिश्तेदार मिल गया है।
परंपरा में माना जाता है कि मिलनी में गले मिलने से दोनों परिवारों के बीच की औपचारिकता टूटती है और आगे का रिश्ता सहज होता है। माला पहनाना सम्मान का संकेत है।
कौन क्या करता है
- दोनों परिवार पहले से तय कर लेते हैं कि कौन किससे मिलेगा।
- दुल्हन के परिवार की ओर से एक व्यक्ति नाम पुकारता है, जैसे "दोनों के मामा", और दोनों आगे आते हैं।
- माला पहनाई जाती है, गले मिला जाता है और कई बार शगुन दिया जाता है।
- सिख परिवारों में मिलनी से पहले अक्सर अरदास होती है।
- मिलनी के बाद बारातियों को नाश्ता या चाय दी जाती है।
कब होती है
मिलनी बारात के पहुँचने के तुरंत बाद होती है। इसके बाद दूल्हा अंदर आता है और जयमाला की रस्म होती है। सिख शादियों में मिलनी अक्सर सुबह गुरुद्वारे में आनंद कारज से पहले होती है।
क्षेत्रीय अंतर
पंजाबी और सिख परिवारों में मिलनी एक व्यवस्थित और बड़ी रस्म होती है। उत्तर प्रदेश और बिहार में बारात का स्वागत "द्वार पूजा" या "द्वारचार" से होता है, जिसमें दुल्हन के घर के दरवाज़े पर दूल्हे की पूजा और स्वागत होता है। राजस्थान में "तोरण" की रस्म होती है, जिसमें दूल्हा दरवाज़े पर लगे तोरण को छूता है। गुजरात में "पोंखणा" में दुल्हन की माँ दूल्हे का स्वागत करती है। दक्षिण भारत में "एदिर सेवई" जैसी रस्म में दुल्हन का परिवार दूल्हे के परिवार का स्वागत करता है। रूप अलग है, भाव एक: आने वाले परिवार का सम्मानपूर्वक स्वागत।
आज के परिवारों के लिए व्यावहारिक सुझाव
- मिलनी की सूची पहले से बनाएँ और दोनों परिवारों से साझा करें, ताकि मौके पर कोई छूट न जाए।
- सूची बहुत लंबी न रखें। बहुत ज़्यादा जोड़ियों से मिलनी लंबी हो जाती है और बाराती थक जाते हैं।
- शगुन या उपहार की राशि और प्रकार को लेकर पहले से सहमति कर लें, ताकि किसी को असहज न लगे।
- आजकल कई परिवार मिलनी में महिलाओं, जैसे दोनों माताओं, को भी शामिल करते हैं। यह रिश्तों को और गर्म बनाता है।
- हर जोड़ी की एक तस्वीर ज़रूर लें, ये तस्वीरें बाद में बहुत प्यारी यादें बनती हैं।
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मिलनी में कौन किससे मिलता है?
दोनों परिवारों के बराबर रिश्ते वाले लोग आपस में मिलते हैं, जैसे दोनों पिता, दोनों मामा, दोनों चाचा। सूची पहले से तय की जाती है।
मिलनी में क्या दिया जाता है?
आम तौर पर माला, शगुन के पैसे या कोई छोटा उपहार जैसे शॉल या कंबल। यह परिवार की परंपरा पर निर्भर करता है।
क्या मिलनी में महिलाएँ भी शामिल होती हैं?
परंपरागत रूप से यह पुरुषों की रस्म रही है, पर आजकल बहुत से परिवार दोनों माताओं और दूसरी महिलाओं को भी शामिल करते हैं।
मिलनी कब होती है?
बारात पहुँचने के तुरंत बाद, जयमाला से पहले। सिख शादियों में यह अक्सर सुबह गुरुद्वारे में होती है।
मिलान के आँकड़े TrueSaath के निःशुल्क कैलकुलेटर द्वारा गणित पारंपरिक गुण मिलान हैं, और संदर्भ के लिए हैं, सलाह के रूप में नहीं।