मुखपृष्ठ›विवाह की रस्में›जयमाला

Read in English

विवाह के दिन

जयमाला की रस्म: वरमाला का अर्थ और परंपरा

जयमाला, जिसे वरमाला भी कहते हैं, वह रस्म है जिसमें दूल्हा और दुल्हन सबके सामने एक-दूसरे को फूलों की माला पहनाते हैं। इसे दोनों की आपसी स्वीकृति का पहला सार्वजनिक संकेत माना जाता है।

जयमाला क्या है

जयमाला की रस्म में दुल्हन और दूल्हा एक मंच पर आमने-सामने खड़े होते हैं और एक-दूसरे को फूलों की माला पहनाते हैं। आम तौर पर पहले दुल्हन दूल्हे को माला पहनाती है और फिर दूल्हा दुल्हन को, हालाँकि कुछ परिवारों में क्रम अलग होता है।

यह रस्म बारात के आने और मिलनी या द्वार पूजा के बाद होती है। आजकल के ज़्यादातर शादी समारोहों में यह सबसे ज़्यादा तस्वीरों वाला पल होता है, क्योंकि लगभग सभी मेहमान इसी समय मंच के सामने जुटते हैं।

अर्थ और प्रतीक

"जय" का अर्थ है जीत और "माला" यानी फूलों की लड़ी। "वरमाला" में "वर" का अर्थ है चुना गया जीवनसाथी। पुरानी कथाओं में "स्वयंवर" का ज़िक्र आता है, जिसमें कन्या अपनी पसंद के वर के गले में माला डालकर उसे चुनती थी। परंपरा में माना जाता है कि जयमाला उसी भाव से जुड़ी है, यानी दोनों अपनी मर्ज़ी से एक-दूसरे को स्वीकार कर रहे हैं।

फूलों की माला ताज़गी, सुंदरता और खुशी का प्रतीक है। गले में माला डालना किसी का सम्मान करना और उसे अपना मानना भी है।

कौन क्या करता है

  • दुल्हन को उसके भाई, मामा या सहेलियाँ मंच तक लेकर आते हैं।
  • दूल्हा पहले से मंच पर होता है या दुल्हन के साथ ही पहुँचता है।
  • दोनों एक-दूसरे को माला पहनाते हैं और मेहमान फूल बरसाते हैं।
  • मज़े के लिए दूल्हे के दोस्त उसे ऊपर उठा लेते हैं, ताकि दुल्हन माला न पहना सके, और दुल्हन के भाई भी उसे उठा लेते हैं। यह हल्की-फुल्की छेड़छाड़ है।
  • इसके बाद दोनों परिवार मंच पर आकर तस्वीरें लेते हैं और आशीर्वाद देते हैं।

कब होती है

जयमाला बारात के स्वागत और मिलनी के बाद होती है। इसके बाद मंडप में शादी की मुख्य रस्में शुरू होती हैं, जिनमें सबसे पहले अक्सर कन्यादान आता है। कई परिवार जयमाला का समय भी विवाह मुहूर्त के आसपास रखते हैं, ताकि फेरे सही समय पर शुरू हो सकें।

क्षेत्रीय अंतर

उत्तर भारत में जयमाला मंच पर बड़े समारोह की तरह होती है। बंगाल में "माला बदल" होता है, जिसमें दुल्हन को उसके भाई एक पीढ़े पर बैठाकर उठाते हैं और वह पान के पत्तों से चेहरा ढके रहती है, फिर "शुभो दृष्टि" में पहली बार दूल्हे को देखती है और माला बदली जाती है। दक्षिण भारत में "मालै मात्तल" होता है, जिसमें दूल्हा-दुल्हन तीन बार माला बदलते हैं, और परिवार के लोग उन्हें कंधों पर उठाते हैं। गुजरात में "वरमाला" मंडप में होती है। हर जगह मूल भाव एक-दूसरे को स्वीकार करना है।

आज के परिवारों के लिए व्यावहारिक सुझाव

  • माला बहुत भारी न हो। भारी माला कंधों पर देर तक पहनना थकाने वाला होता है।
  • उठाने वाला खेल मज़ेदार है, पर सुरक्षा का ध्यान रखें। मंच की ऊँचाई और भीड़ देखते हुए इसे हल्का रखें।
  • दूल्हा और दुल्हन से पहले पूछ लें कि क्या वे यह खेल चाहते हैं। कई जोड़े अब इसे बिना छेड़छाड़ के, गरिमा से करना पसंद करते हैं।
  • माला पहनाने का क्रम और समय फ़ोटोग्राफ़र को बता दें, ताकि पल कैद हो सके।
  • असली फूलों की माला उसी दिन मँगवाएँ और उसे ठंडी जगह रखें।

बाकी रस्मों के लिए विवाह की रस्में देखें।

तारीख तय कर रहे हैं?

मुहूर्त कैलेंडर में हर महीने की शुभ विवाह तिथियाँ और उनके समय हैं।

विवाह मुहूर्त कुंडली मिलान

Questions people ask

जयमाला में पहले माला कौन पहनाता है?

ज़्यादातर परिवारों में पहले दुल्हन दूल्हे को माला पहनाती है और फिर दूल्हा दुल्हन को। कुछ परिवारों में यह क्रम उलटा भी होता है।

जयमाला और वरमाला में क्या फ़र्क है?

दोनों एक ही रस्म के नाम हैं। कुछ इलाकों में जयमाला कहा जाता है और कुछ में वरमाला।

जयमाला में दूल्हे को उठाया क्यों जाता है?

यह एक मज़ेदार परंपरा है जिसमें दोनों पक्ष हँसी-खेल में मुकाबला करते हैं। इसका कोई धार्मिक नियम नहीं है और इसे छोड़ा भी जा सकता है।

जयमाला के फूल कौन-से हों?

गुलाब, गेंदा, रजनीगंधा और ऑर्किड आम हैं। दुल्हन के कपड़ों के रंग और मौसम को देखकर फूल चुनें।

मिलान के आँकड़े TrueSaath के निःशुल्क कैलकुलेटर द्वारा गणित पारंपरिक गुण मिलान हैं, और संदर्भ के लिए हैं, सलाह के रूप में नहीं।