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विवाह के बादपग फेरा की रस्म: शादी के बाद पहली बार मायके जाना
पग फेरा वह रस्म है जिसमें शादी के कुछ दिन बाद नई दुल्हन पहली बार अपने मायके जाती है और फिर पति के साथ ससुराल लौटती है। यह शादी की रस्मों की आख़िरी कड़ी मानी जाती है।
पग फेरा क्या है
"पग" का अर्थ है पैर या कदम और "फेरा" का अर्थ है लौटना। यानी पग फेरा में दुल्हन के कदम एक बार फिर मायके की ओर पड़ते हैं। शादी के कुछ दिनों बाद दुल्हन का भाई या परिवार का कोई सदस्य उसे लेने ससुराल आता है। दुल्हन मायके जाती है, वहाँ कुछ समय बिताती है, और फिर उसका पति उसे लेने आता है और दोनों साथ लौटते हैं।
यह रस्म ख़ासकर उत्तर भारत, जैसे पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में प्रचलित है।
अर्थ और प्रतीक
परंपरा में माना जाता है कि पग फेरा यह दिखाता है कि शादी के बाद भी बेटी का अपने मायके से रिश्ता उतना ही मज़बूत है। विदाई के भावुक पल के बाद यह रस्म दोनों परिवारों को भरोसा देती है कि बेटी खुश है और दोनों घरों के दरवाज़े उसके लिए खुले हैं।
दामाद का पत्नी को लेने ससुराल जाना इस बात का प्रतीक है कि वह उसके परिवार का सम्मान करता है। इस मौके पर दुल्हन का परिवार दामाद का ख़ास स्वागत करता है, उसे भोजन कराता है और उपहार देता है। कई परिवारों में यह दामाद की ससुराल की पहली औपचारिक यात्रा मानी जाती है।
दुल्हन जब ससुराल लौटती है, तो वह अक्सर मायके से मिठाई, कपड़े और उपहार लेकर जाती है, जो दोनों परिवारों के बीच प्यार के आदान-प्रदान को दिखाता है।
कौन क्या करता है
- दुल्हन का भाई, और कभी-कभी पिता या कोई दूसरा रिश्तेदार, उसे ससुराल से लेने आता है।
- दुल्हन मायके में कुछ समय, आम तौर पर एक दिन या कुछ दिन, बिताती है।
- दूल्हा उसे लेने ससुराल आता है और वहाँ उसका सत्कार होता है।
- दुल्हन का परिवार दामाद और बेटी को उपहार देकर विदा करता है।
- कई घरों में मायके पहुँचने पर दुल्हन की नज़र उतारी जाती है और उसके पसंदीदा पकवान बनते हैं।
कब होती है
पग फेरा आम तौर पर शादी, गृह प्रवेश और मुँह दिखाई के बाद, कुछ ही दिनों के भीतर होता है। कुछ परिवार इसके लिए शुभ दिन देखते हैं, जिसके लिए मुहूर्त की जानकारी उपयोगी हो सकती है।
क्षेत्रीय अंतर
पंजाब और हरियाणा में "फेरा पाना" या पग फेरा बहुत आम रस्म है। बिहार और उत्तर प्रदेश के कई परिवारों में "द्विरागमन" या "गौना" की परंपरा रही है, जिसमें पहले विवाह होता था और बाद में दुल्हन को ससुराल भेजा जाता था, हालाँकि अब यह बहुत कम दिखता है। बंगाल में "द्विरागमन" या "अष्टमंगला" नाम की रस्म होती है, जिसमें नवविवाहित जोड़ा शादी के कुछ दिनों बाद दुल्हन के मायके जाता है। गुजरात और महाराष्ट्र में भी शादी के बाद पहली बार मायके जाने से जुड़ी अपनी-अपनी रस्में हैं। दक्षिण भारत में कई परिवारों में शादी के बाद जोड़ा कुछ दिन दुल्हन के घर रुकता है।
आज के परिवारों के लिए व्यावहारिक सुझाव
- अगर दोनों परिवार अलग-अलग शहरों में हैं, तो पग फेरे की तारीख़ और यात्रा पहले से तय कर लें।
- दूल्हा-दुल्हन की छुट्टियों और काम के हिसाब से समय चुनें, ताकि रस्म बोझ न लगे।
- उपहारों को लेकर किसी तरह की होड़ न रखें। यह रस्म रिश्ते की गर्माहट के लिए है।
- दुल्हन को मायके में आराम से रहने का समय दें। शादी की भाग-दौड़ के बाद यह उसके लिए सुकून का मौका होता है।
- यह रस्म शादी की रस्मों की आख़िरी कड़ी है। पूरे क्रम को फिर से देखने के लिए विवाह की रस्में पेज पर जाएँ।
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मुहूर्त कैलेंडर में हर महीने की शुभ विवाह तिथियाँ और उनके समय हैं।
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पग फेरा कब होता है?
आम तौर पर शादी के कुछ दिनों के भीतर, गृह प्रवेश और मुँह दिखाई के बाद। कई परिवार इसके लिए शुभ दिन देखते हैं।
पग फेरे में दुल्हन को कौन लेने आता है?
परंपरा में दुल्हन का भाई उसे ससुराल से लेने आता है। भाई न हो तो पिता या कोई दूसरा रिश्तेदार आ सकता है।
पग फेरे में दूल्हे की क्या भूमिका है?
दूल्हा अपनी पत्नी को मायके से लेने जाता है। इस मौके पर दुल्हन का परिवार दामाद का ख़ास स्वागत करता है।
पग फेरे में दुल्हन मायके में कितने दिन रुकती है?
यह परिवार की परंपरा और सुविधा पर निर्भर करता है। कई जगह एक दिन और कई जगह कुछ दिन।
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